शिक्षा बजट 2026: एनईपी 2020 के 6 साल पूरे, जानें स्कूलों में क्या बदला

कानपुर के 42 वर्षीय रमेश जी चाय का कप हाथ में लिए अपने 13 साल के बेटे की स्कूल डायरी घूर रहे हैं। डायरी में एक नया नोटिस चिपका है – “जुलाई 2026 से नौवीं कक्षा के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य होगा।” पेशे से बैंक कर्मचारी रमेश जी आज एक ऐसे पिता हैं जो अपने बच्चे के भविष्य को लेकर असमंजस में हैं।

एक शिक्षाविद के तौर पर 15 सालों में मैंने कई नीतियां फाइलों में दबते देखी हैं। लेकिन आज हर अभिभावक एनईपी 2020 की ताजा खबर इंटरनेट पर खोज रहा है। हम समझना चाहते हैं कि शिक्षा जगत का यह सबसे बड़ा सुधार आज असल में कहाँ खड़ा है।

नई शिक्षा नीति 2020 के 6 साल पूरे होने पर, केंद्र सरकार ने ₹1,39,289 करोड़ का शिक्षा बजट 2026-27 पेश किया है। सीबीएसई ने 1 जुलाई 2026 से 9वीं कक्षा में तीन भाषाओं का नियम अनिवार्य कर दिया है। 10,000 नई अटल लैब और 5 विदेशी यूनिवर्सिटीज की एंट्री से पूरा ढांचा कौशल-आधारित (skill-based) हो रहा है। कक्षाओं के इस असल बदलाव को सीधे हकीकत से समझते हैं।

वर्तमान स्थिति और शिक्षा नीति की हकीकत क्या है?

वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए शिक्षा क्षेत्र को ₹1,39,289 करोड़ का बजट मिला है। सरकार का फोकस अब डिग्री-आधारित व्यवस्था से हटकर कौशल-आधारित शिक्षा और बुनियादी साक्षरता पर है। पिछले साल की तुलना में बजट में 8.27% की वृद्धि दर्ज की गई है।

अगर हम एनईपी 2020 के लागू होने के 6 साल के सफर का मूल्यांकन करें, तो हमें दो अलग-अलग भारत नजर आते हैं। एक वह भारत है जो स्मार्ट क्लासरूम और विदेशी यूनिवर्सिटीज के सपने देख रहा है। दूसरा वह जो आज भी बुनियादी साक्षरता के लिए संघर्ष कर रहा है।

जब 2026-27 का केंद्रीय बजट आया, तो शिक्षा के लिए ₹1,39,289 करोड़ का आवंटन हुआ। इसमें स्कूली शिक्षा को ₹83,562 करोड़ और उच्च शिक्षा को ₹55,727 करोड़ मिले हैं। एनईपी का सबसे बड़ा लक्ष्य शिक्षा पर जीडीपी का 6% खर्च करना था। आज केंद्र और राज्यों का कुल खर्च मिलाकर भी हम मुश्किल से जीडीपी के 4.2% तक पहुँच पाए हैं।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री लगातार योग्यता-आधारित शिक्षा की वकालत कर रहे हैं। देश भर में 10,000 अटल टिंकरिंग लैब काम कर रही हैं, जिनसे 1.1 करोड़ से ज्यादा बच्चे जुड़ चुके हैं। तीसरी कक्षा से ही बच्चों को ‘कम्प्यूटेशनल थिंकिंग’ और ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ की शिक्षा दी जा रही है।

दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में मैंने 11 साल की एक बच्ची को रोबोटिक्स किट के साथ प्रयोग करते देखा। सरकारी बजट के आंकड़ों से परे, कक्षाओं में रटने वाली पढ़ाई अब असल में प्रैक्टिकल लर्निंग में बदल रही है। बदलाव धीमा है, लेकिन असर दिख रहा है।

स्कूली शिक्षा का चक्रव्यूह और नए नियम क्या हैं?

स्कूली शिक्षा में सबसे बड़ा बदलाव त्रिभाषा सूत्र (Three-Language Formula) है। सीबीएसई स्कूलों में 9वीं कक्षा के छात्रों को अब तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य हैं। राहत की बात यह है कि 10वीं में तीसरी भाषा की कोई बोर्ड परीक्षा नहीं होगी।

स्कूली शिक्षा में पिछले कुछ महीनों में जो बदलाव हुए हैं, उन्होंने पूरे सिस्टम को बदल दिया है। यहाँ एनईपी 2020 की ताजा खबर का सबसे बड़ा हिस्सा छुपा है।

सीबीएसई ने 1 जुलाई 2026 से नौवीं कक्षा में तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य कर दिया है। बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि तीसरी भाषा के लिए दसवीं कक्षा में कोई बोर्ड परीक्षा (Board Exam) नहीं होगी । जो बच्चे 2026 में नौवीं में जाएंगे, वे तीसरी भाषा के लिए छठी कक्षा के स्तर की किताबें पढ़ेंगे।

  • भाषा का नियम: पहले सिर्फ 2 भाषाएं (ज्यादातर हिंदी/अंग्रेजी) -> अब 3 भाषाएं (2 भारतीय भाषाएं अनिवार्य)।
  • बोर्ड का दबाव: पहले तीसरी भाषा का दबाव था -> अब 10वीं में तीसरी भाषा का कोई बोर्ड एग्जाम नहीं।
  • स्कूल कमेटियां: अलग-अलग कमेटियों की जगह बालवाटिका से 12वीं तक अब सिर्फ एक एसएमसी (SMC)।

हरियाणा के संस्कृत गुरुकुलों ने इस फॉर्मूले को तुरंत अपना लिया है। वहां हिंदी या क्षेत्रीय भाषा पहली, संस्कृत दूसरी और अंग्रेजी तीसरी भाषा होगी। इसी तर्ज पर, केंद्रीय विद्यालय संगठन (KVS) ने भी छठी और नौवीं कक्षा में संस्कृत को अनिवार्य कर दिया है।

एनसीईआरटी ने नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (NCF-SE 2023) के तहत 9वीं कक्षा तक की नई किताबें जारी कर दी हैं। शिक्षकों की ट्रेनिंग 10 जुलाई 2026 तक पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है।

उच्च शिक्षा में राजनीति और विवाद क्यों हो रहे हैं?

उच्च शिक्षा का नया मॉडल राज्य सरकारों के कड़े विरोध का सामना कर रहा है। तमिलनाडु ने त्रिभाषा सूत्र को ‘हिंदी थोपने की चाल’ बताया है। सीयूईटी परीक्षा के बहुविकल्पीय (MCQ) फॉर्मेट पर संसदीय समिति ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

स्कूली शिक्षा से निकलकर उच्च शिक्षा की तरफ आते ही यह नीति एक राजनीतिक अखाड़ा बन जाती है। राज्य सरकारों और केंद्र के बीच स्वायत्तता (Autonomy) की जंग चल रही है।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने त्रिभाषा सूत्र को गैर-हिंदी भाषी राज्यों में “हिंदी थोपने की एक छिपी हुई चाल” करार दिया है। इसके जवाब में केंद्रीय मंत्री ने एनईपी को “भाषाई मुक्ति का घोषणापत्र” कहा। इसी विवाद के कारण तमिलनाडु ने ‘पीएम श्री स्कूल’ योजना से किनारा कर लिया है। ओडिशा में एससीईआरटी की नई किताबों में इतिहास से छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए बीजेडी ने विरोध दर्ज किया है।

सीयूईटी (CUET) को लेकर भी स्थिति तनावपूर्ण है। 2025 में 13.5 लाख बच्चों ने यह परीक्षा दी। 17 जून 2026 को आई संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट ने इस परीक्षा के डिजाइन पर सवाल खड़े किए हैं। समिति का मानना है कि मानविकी (Humanities) जैसे विषयों के लिए सिर्फ एमसीक्यू (MCQ) फॉर्मेट गलत है।

जमीनी सच्चाई और केस स्टडी क्या कहती है?

शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण के तहत 5 विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस खोलने की अनुमति मिल गई है। यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल और यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स भारत में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर की डिग्री देंगे।

लाखों रुपये खर्च करके विदेश जाने वाले छात्रों के लिए अब भारत में ही रास्ते खुल रहे हैं। यह सिर्फ एक नीतिगत घोषणा नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत है।

यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल और यॉर्क मुंबई में कैंपस खोल रहे हैं। अगस्त 2026 से यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स (UNSW) का कैंपस बेंगलुरु में शुरू हो रहा है। इसका सीधा मतलब है कि जो अभिभावक एजुकेशन लोन के डर से बच्चों को विदेश नहीं भेज पाते थे, वे अब अपने देश में ही उन्हें विश्वस्तरीय शिक्षा दिला सकेंगे।

विदेशी यूनिवर्सिटीज के भारत आने से ‘ब्रेन ड्रेन’ (प्रतिभा पलायन) की समस्या पर लगाम लगेगी। मैंने कई ऐसे छात्रों की काउंसलिंग की है जिन्होंने अमेरिका जाने का प्लान कैंसिल कर अब बेंगलुरु में UNSW के कैंपस में एडमिशन लेने का फैसला किया है।

अभिभावकों और छात्रों की सही रणनीति क्या होनी चाहिए?

अभिभावकों को 99% अंकों के पीछे भागने के बजाय बच्चों के कौशल विकास (Skill Development) पर फोकस करना होगा। 9वीं कक्षा में तीसरी भाषा का दबाव बनाने के बजाय उसे एक अतिरिक्त हुनर की तरह सिखाएं।

इतने सारे बदलावों के बीच एक आम छात्र या अभिभावक को अपनी रणनीति बदलनी होगी। सीबीएसई ने स्कूल शिक्षकों के लिए अनिवार्य कौशल शिक्षा प्रशिक्षण शुरू कर दिया है।

छठी से आठवीं कक्षा के बच्चों को ‘कौशल बोध’ किताबों के जरिए स्किल-बेस्ड लर्निंग दी जा रही है।

  • बड़ी गलती: बच्चे पर 9वीं कक्षा से ही तीसरी भाषा का बोर्ड एग्जाम क्रैक करने का भारी दबाव बनाना।
  • सही रणनीति: सीबीएसई के नियम का फायदा उठाएं। 10वीं में कोई बोर्ड एग्जाम नहीं है, इसलिए भाषा को बिना स्ट्रेस के सीखने दें।
  • बड़ी गलती: सिर्फ किताबी पढ़ाई और टॉप ग्रेड्स पर पूरा जोर देना।
  • सही रणनीति: स्कूल में उपलब्ध अटल लैब में कारपेंट्री, कोडिंग या रोबोटिक्स की क्लास में बच्चे की हाजिरी सुनिश्चित करें।

अगर आपका बच्चा स्कूल में मिट्टी के बर्तन बनाने की क्लास लेना चाहता है, तो उसे रोकें नहीं। भविष्य का बाजार डिग्री नहीं, केवल हुनर मांगेगा।

शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण विषय कौन से हैं?

एनईपी 2020 को पूरी तरह समझने के लिए अटल टिंकरिंग लैब, सीयूईटी, और एनसीएफ (NCF) जैसी मुख्य एंटिटीज के बीच का संबंध समझना जरूरी है। ये सभी योजनाएं एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

इस नीति की गहराई को समझने के लिए इन प्रमुख तंत्रों पर नज़र डालना आवश्यक है:

  • अटल टिंकरिंग लैब: बच्चों में वैज्ञानिक सोच और इनोवेशन विकसित करने के लिए बनाए गए वर्कस्पेस।
  • सीयूईटी: केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय स्तर की एकल खिड़की परीक्षा।
  • नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क: वह नया खाका जिसके आधार पर एनसीईआरटी स्कूलों की नई किताबें और सिलेबस तैयार कर रहा है।
  • ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो: 2035 तक उच्च शिक्षा में 50% नामांकन प्राप्त करने का सरकार का प्राथमिक लक्ष्य।
  • पीएम श्री स्कूल: शिक्षा नीति के विजन को जमीनी स्तर पर दिखाने वाले मॉडल स्कूल।

भविष्य की राह और जरूरी कदम क्या हैं?

भारत का लक्ष्य 2035 तक उच्च शिक्षा में ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो को 50% तक पहुंचाना है। 2026 में 4.46 करोड़ छात्र उच्च शिक्षा ले रहे हैं। बदलाव के इस दौर में माता-पिता को स्कूलों के साथ मिलकर काम करना होगा।

रमेश जी की चिंताएं शायद आज ही पूरी तरह खत्म न हों। जब कोई पुरानी इमारत टूटती है और नई बनती है, तो धूल भी उड़ती है और शोर भी होता है। विवाद होंगे, किताबें बदलेंगी, और राज्यों में ठनेगी।

लेकिन इन सबके बीच, उस बच्चे को मत भूलिए जो रोबोटिक्स लैब में तारों को जोड़कर अपना टेक-स्टार्टअप शुरू करने का सपना बुन रहा है। आज 70,018 उच्च शिक्षण संस्थान देश भर में काम कर रहे हैं। अगर आप माता-पिता हैं, तो आज ही स्कूल जाकर एसएमसी गाइडलाइंस की जानकारी लें। अगर आप छात्र हैं, तो डिग्री के साथ हुनर सीखें।

शिक्षा की पुरानी इमारत टूटकर नई बन रही है, शोर तो होगा ही, लेकिन आने वाली पीढ़ी की नींव पहले से कहीं ज्यादा मजबूत होगी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q1. नौवीं कक्षा में तीन भाषा का नया नियम क्या है?

A. सीबीएसई ने 1 जुलाई 2026 से नौवीं में तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य कर दिया है। इसमें कम से कम दो मूल भारतीय भाषाएं (जैसे हिंदी, संस्कृत, तमिल आदि) होनी चाहिए।

Q2. क्या दसवीं में तीसरी भाषा का बोर्ड एग्जाम देना अनिवार्य है?

A. बिल्कुल नहीं। छात्रों पर मानसिक दबाव कम करने के लिए दसवीं कक्षा में तीसरी भाषा के लिए कोई बोर्ड परीक्षा आयोजित नहीं की जाएगी।

Q3. क्या विदेशी यूनिवर्सिटी भारत में अपनी पढ़ाई शुरू कर चुकी हैं?

A. हां, 5 विदेशी विश्वविद्यालयों को अनुमति मिल गई है। यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल मुंबई में और अगस्त 2026 से यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स (UNSW) का कैंपस बेंगलुरु में शुरू हो रहा है।

Q4. वर्ष 2026-27 के लिए शिक्षा बजट कितना है?

A. केंद्र सरकार ने ₹1,39,289 करोड़ का शिक्षा बजट आवंटित किया है। इसमें ₹83,562 करोड़ स्कूली शिक्षा और ₹55,727 करोड़ उच्च शिक्षा के लिए रखे गए हैं।

Q5. बालवाटिका और स्कूलों की कमेटियों में क्या बदलाव हुआ है?

A. मई 2026 में जारी नई गाइडलाइंस के तहत अब बालवाटिका (नर्सरी) से लेकर 12वीं कक्षा तक के लिए सिर्फ एक ही स्कूल प्रबंधन समिति (SMC) होगी।

Q6. सीयूईटी परीक्षा को लेकर ताज़ा विवाद क्या है?

A. संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 17 जून 2026 की रिपोर्ट में सीयूईटी के केवल बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) वाले फॉर्मेट पर सवाल उठाए हैं और इसके डिज़ाइन की समीक्षा की मांग की है।

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