अप्रैल 2026 का महीना था। दिल्ली के एक नामी स्कूल में पेरेंट्स-टीचर मीटिंग (PTA) चल रही थी। सातवीं क्लास में जाने वाले बच्चों के पैरेंट्स तो रिलैक्स थे, लेकिन जो बच्चे पाँचवीं पास करके छठी में आ रहे थे, उनके WhatsApp ग्रुप्स में एक अजीब सी खलबली मची हुई थी।
“ये कौशल बोध कक्षा 6 में नया सब्जेक्ट क्या आ गया है?” एक माँ ने परेशान होकर पूछा। “क्या इसके लिए अलग से ट्यूशन लगवानी पड़ेगी? इसके प्रोजेक्ट्स कैसे होंगे?”
दूसरी तरफ, टीचर्स के स्टाफ रूम में अलग ही टेंशन थी। साइंस और मैथ्स की टीचर परेशान थीं कि 40 मिनट के पीरियड में बच्चे ‘किचन गार्डन’ या ‘मेकर स्किल्स’ का प्रोजेक्ट कैसे पूरा करेंगे?
अगर आप भी एक पैरेंट हैं जिसका बच्चा 2026-27 के सेशन में मिडिल स्कूल (Class 6-8) में जा रहा है, या आप एक स्कूल टीचर हैं जो नए टाइमटेबल को लेकर कन्फ्यूज हैं, तो आप अकेले नहीं हैं। CBSE ने 28 अक्टूबर 2025 को एक ऐतिहासिक सर्कुलर जारी किया था। इसने भारत की शिक्षा व्यवस्था में वो बदलाव कर दिया है जिसका इंतज़ार हमें सालों से था – किताबी रटंत विद्या से प्रैक्टिकल स्किल्स की तरफ एक बड़ा कदम।
कौशल बोध सिर्फ एक और किताब नहीं है, यह एक पूरा ‘माइंडसेट शिफ्ट’ है। आइए डिकोड करते हैं कि असल में क्लासरूम और आपके घर में क्या बदलने वाला है।
कौशल बोध क्या है और एनईपी 2020 से इसका क्या जुड़ाव है?
‘कौशल बोध’ कक्षा 6 से 8 के लिए एक अनिवार्य व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education) पाठ्यक्रम है। एनईपी 2020 और एनसीएफ-एसई 2023 के तहत डिज़ाइन किए गए इस करिकुलम में थ्योरी के बजाय हैंड्स-ऑन प्रोजेक्ट्स (जैसे किचन गार्डन, मेकर स्किल्स) पर ज़ोर दिया गया है, जिन्हें बिना बैग (Bagless days) के पूरा किया जाएगा।
इसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे, साल 2020 में जाना होगा। जब एनईपी 2020 (NEP 2020) आई थी, तो उसमें एक बहुत ही खूबसूरत सपना देखा गया था हमारे बच्चे सिर्फ थ्योरी न पढ़ें, बल्कि अपने हाथों से काम करना सीखें। इसी विजन को ज़मीन पर उतारने के लिए एनसीएफ-एसई 2023 (NCF-SE) ने मिडिल स्टेज में व्यावसायिक शिक्षा को पूरी तरह से इंटीग्रेट करने की बात कही।
‘कौशल बोध’ उसी विजन का नाम है। 2026-27 के अकादमिक सत्र से एनसीईआरटी की यह नई टेक्स्टबुक मिडिल स्कूल के लिए अनिवार्य कर दी गई है। यह कोई आम साइंस या सोशल स्टडीज की किताब नहीं है; यह एक ‘एक्शन-बुक’ है।
इसमें मुख्य रूप से दो बातों पर फोकस है:
- किताब कम, काम ज़्यादा: बच्चों को साल भर में 3 बड़े हैंड्स-ऑन प्रोजेक्ट्स करने होंगे।
- बैगलेस डेज़ (Bagless Days): बच्चे स्कूल बिना भारी बैग के जाएंगे और मिट्टी, टूल्स, और डिज़ाइन के साथ खेलेंगे।
पहले हमारे देश में ‘स्किल्स’ को सिर्फ पढ़ाई में कमज़ोर बच्चों के लिए माना जाता था। लेकिन कौशल बोध ने इस धारणा को तोड़ दिया है। अब शर्मा जी का टॉपर बेटा भी जब तक अपने हाथों से हथौड़ा चलाना या बीज बोना नहीं सीखेगा, उसका असेसमेंट पूरा नहीं होगा।
तीन वर्क डोमेन समझें – लाइफ फॉर्म्स, मशीन्स और ह्यूमन सर्विसेज
कौशल बोध के पूरे सिलेबस को तीन मुख्य वर्क डोमेन्स में बांटा गया है: 1. लाइफ फॉर्म्स (कृषि और प्रकृति), 2. मशीन्स एंड मटेरियल्स (टूल्स और इंजीनियरिंग बेसिक्स), 3. ह्यूमन सर्विसेज (डिजिटल टूल्स और कम्युनिटी सर्विस)। हर डोमेन एक प्रैक्टिकल स्किल विकसित करता है।
सीबीएसई और एनसीईआरटी ने पूरे साल की गतिविधियों को तीन ‘Work Domains’ (कार्य क्षेत्रों) में बाँट दिया है। बच्चे को इन तीनों से गुज़रना होगा:
- लाइफ फॉर्म्स (प्रकृति और जीवन): इसमें बच्चे प्रकृति, पेड़-पौधों और कृषि से जुड़ते हैं। उन्हें समझना होता है कि एक बीज से पौधा कैसे बनता है और उसकी देखभाल कैसे की जाती है। Kitchen Garden (किचन गार्डन) इसका सबसे क्लासिक उदाहरण है।
- मशीन्स और मटेरियल्स (इंजीनियरिंग बेसिक्स): यह डोमेन डिज़ाइन थिंकिंग का बेस है। बच्चे लकड़ी, वायर, गत्ते और बेसिक टूल्स का इस्तेमाल करके चीज़ें बनाना (Maker Skills) सीखते हैं।
- ह्यूमन सर्विसेज (तकनीक और समाज): टेक्नोलॉजी और समाज के बीच का तालमेल। कक्षा 6 में ‘एनिमेशन्स और गेम्स’ (Animations & Games) डिज़ाइन करना इसी का हिस्सा है, जहाँ बच्चे डिजिटल टूल्स के ज़रिए प्रॉब्लम सॉल्विंग सीखते हैं।
सोचिए, एक 11 साल का बच्चा जो सिर्फ मोबाइल पर गेम खेलता था, अब खुद का एक छोटा सा एनीमेशन बना रहा है। यह माइंडसेट शिफ्ट किसी भी पेरेंट के लिए बेहद सुखद है!
कक्षा 6 का मंथ वाइज प्रोजेक्ट कैलेंडर – अप्रैल से मार्च 2027 तक
कई एजुकेशन ब्लॉग्स इस पूरे करिकुलम का ‘टाइमलाइन’ मिस कर रहे हैं। टीचर्स और पैरेंट्स के लिए यह जानना सबसे ज़रूरी है कि किस महीने में क्या होने वाला है:
- अप्रैल (लाइफ फॉर्म्स): नया सेशन शुरू होते ही बच्चों को प्रकृति से जोड़ा जाएगा। पूरा फोकस Kitchen Garden प्रोजेक्ट पर होगा। बच्चे स्कूल के एक हिस्से में या गमलों में मिट्टी तैयार करेंगे और बीज बोने का शेड्यूल बनाएंगे।
- जुलाई (मशीन्स एंड मटेरियल्स): गर्मियों की छुट्टियों के बाद, बच्चे ‘Maker Skills’ पर काम करेंगे। स्कूल की ‘कम्पोजिट स्किल लैब’ में बच्चे बेसिक टूल्स (हथौड़ी, पेंचकस, मेजरिंग टेप) का सुरक्षित इस्तेमाल सीखेंगे।
- अगस्त (डिजिटल दुनिया की सैर): अगस्त का महीना ‘Human Services’ डोमेन के तहत ‘Animations & Games’ के लिए रिज़र्व्ड है। बच्चे कंप्यूटर लैब में बेसिक कोडिंग या एनीमेशन सॉफ्टवेयर आज़माएंगे।
एक बहुत ज़रूरी बात याद रखें: ये सिर्फ 3 महीने का काम नहीं है। किचन गार्डन में अप्रैल में बोए गए बीज की ऑब्ज़र्वेशन और हार्वेस्टिंग महीनों तक चलती रहती है।
स्कूलों में कौशल बोध का टाइमटेबल कैसा होगा – शेड्यूलिंग सीक्रेट
40 मिनट के रेगुलर पीरियड में प्रोजेक्ट्स पूरे नहीं हो सकते, इसलिए सर्कुलर Skill-81/2025 के अनुसार स्कूलों को हफ़्ते में दो दिन लगातार दो पीरियड्स (80 मिनट का ब्लॉक) अलॉट करने होंगे। साल भर में कुल 110 घंटे इसके लिए रिज़र्व्ड हैं।
अगर आप एक स्कूल प्रिंसिपल या टाइमटेबल इंचार्ज हैं, तो यह सेक्शन आपकी सबसे बड़ी परेशानी हल कर देगा।
मैंने पिछले कुछ हफ्तों में सैकड़ों टीचर्स से बात की है। सबकी एक ही शिकायत है: “सर, 40 मिनट के पीरियड में मैं बच्चों को लैब में ले जाऊं, टूल्स बांटू, प्रोजेक्ट करवाऊं और वापस क्लास में लाऊं? यह तो नामुमकिन है!”
बिल्कुल सही बात है। और सीबीएसई भी इस बात को समझता है। सर्कुलर में साफ तौर पर लिखा है कि स्कूलों को हर साल स्किल एजुकेशन के लिए 110 घंटे (लगभग 160 पीरियड्स) देने होंगे। (स्रोत: सीबीएसई सर्कुलर Skill-81/2025, 2025)
सर्कुलर के अंदर छुपा हुआ सबसे बड़ा नियम है: “Schools must allocate two consecutive periods, twice a week”. यानी टाइमटेबल में 40 मिनट का सिंगल पीरियड नहीं होगा। 80 मिनट का एक ‘ब्लॉक पीरियड’ (Block Period) हफ़्ते में दो बार होगा। जब बच्चे के पास पूरे 80 मिनट होंगे, तभी वो आराम से प्रोजेक्ट्स में डूब सकेगा बिना इस हड़बड़ी के कि अगली घंटी बजने वाली है।
टीचर्स के लिए इनसाइडर हैक – लोकल कॉन्टेक्स्ट और एनेक्सचर का प्रयोग
अब एक बहुत ही प्रैक्टिकल समस्या की बात करते हैं। दिल्ली या मुंबई के किसी हाई-फाई स्कूल में ‘मेकर स्किल्स’ के लिए फैंसी टूल्स लाना या किचन गार्डन के लिए कोको-पीट मंगाना आसान है। लेकिन रूरल (ग्रामीण) स्कूलों का क्या?
मेरे एक दोस्त जो मेरठ के पास एक गाँव के स्कूल में पढ़ाते हैं, उन्होंने मुझे फ़ोन किया और बोले, “हमारे पास फैंसी किचन गार्डन बनाने का बजट नहीं है। हम क्या करें?”
यहीं पर काम आता है सर्कुलर का ‘Annexure 1-3’। सीबीएसई ने बहुत स्पष्टता से कहा है कि स्कूल अपनी स्थानीय ज़रूरतों और संसाधनों के हिसाब से प्रोजेक्ट्स बदल सकते हैं।
- किचन गार्डन का विकल्प: अगर आप गाँव में हैं, तो ‘Kitchen Garden’ की जगह बच्चों से Vermicomposting (केंचुए की खाद) बनाने का प्रोजेक्ट करवाइए।
- लोकल मटेरियल्स: बांस (Bamboo) या मिट्टी (Terracotta) का काम सिखाइए अगर आपके इलाके में ये संसाधन आसानी से उपलब्ध हैं।
यह ‘कौशल बोध’ की सबसे बड़ी खूबसूरती है – यह हमें अर्बन टेम्पलेट्स थोपने से आज़ाद करता है और हमारी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ता है।
पेरेंट्स के लिए गाइड – जीरो कॉस्ट में बच्चों की मदद कैसे करें
कौशल बोध प्रोजेक्ट्स के लिए बाज़ार से महंगे किट खरीदने की ज़रूरत नहीं है। घर के कबाड़ (प्लास्टिक की बोतलें, पुरानी मोटर, किचन के बीज) का इस्तेमाल करके बच्चे बेहतरीन प्रोजेक्ट्स बना सकते हैं। पेरेंट्स को बच्चों का काम खुद नहीं करना है, सिर्फ उन्हें गाइड करना है।
जैसे ही स्कूलों से कौशल बोध कक्षा 6 के प्रोजेक्ट्स का मैसेज आएगा, कई पैरेंट्स बाज़ार की तरफ भागेंगे रेडीमेड महंगे किट खरीदने के लिए। रुकिए! इसका मकसद बाज़ार को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि बच्चों के दिमाग को क्रिएटिव बनाना है।
यहाँ 5 स्टेप्स की एक प्रैक्टिकल गाइड है:
- कबाड़ से जुगाड़: ‘Machines & Materials’ प्रोजेक्ट के लिए ई-कॉमर्स साइट्स से महंगे किट मत खरीदिए। घर में पड़े पुराने डिब्बे, टूटे हुए खिलौनों की मोटर, और गत्ते इकट्ठे कीजिए। असली मेकर स्किल्स तब उभरती हैं जब बच्चा सीमित संसाधनों से कुछ नया बनाता है।
- किचन से शुरू करें गार्डन: बाज़ार से बीज लाने की ज़रूरत नहीं है। आपके किचन में धनिया, मेथी, सरसों और टमाटर मौजूद हैं। पुरानी बोतलों में मिट्टी भरिए और बच्चों को बीज बोने दीजिए।
- असफलता को सेलिब्रेट करें: अगर बच्चे का बनाया मॉडल काम नहीं कर रहा है या पौधा सूख गया है, तो गुस्सा मत होइए। उससे पूछिए, “चलो देखते हैं इसमें क्या गलती हुई?” यही ‘प्रॉब्लम सॉल्विंग’ है।
- सपोर्ट करें, उनका काम न करें: बच्चे के एनीमेशन प्रोजेक्ट में दिलचस्पी दिखाएं, लेकिन उसका प्रोजेक्ट खुद बनाकर मत दीजिए। परफेक्शन से ज़्यादा प्रोसेस ज़रूरी है।
- सेफ्टी रूल्स: जब बच्चा टूल्स इस्तेमाल कर रहा हो, तो उसे सेफ्टी रूल्स सिखाएं। उसे बताएं कि टूल्स खिलौने नहीं हैं।
असेसमेंट कैसे होगा – इंटरनल मार्क्स में कितना वेटेज
कौशल बोध के लिए कोई लिखित बोर्ड परीक्षा (Written exam) नहीं होगी। इसके मार्क्स स्कूलों के इंटरनल असेसमेंट का हिस्सा होंगे, जो बच्चे की प्रोजेक्ट परफॉरमेंस, टीम-वर्क, अटेंडेंस और प्रॉब्लम-सॉल्विंग स्किल्स पर आधारित होंगे।
सबसे बड़ा सवाल जो हर भारतीय पैरेंट के मन में होता है: Kaushal Bodh ke marks internal me add honge kya?
जवाब है: हाँ, बिल्कुल जुड़ेंगे। लेकिन राहत की बात यह है कि इसका कोई ‘लिखित बोर्ड एग्जाम’ या रट्टाफिकेशन वाला पेपर नहीं होगा। (स्रोत: एनईपी 2020 इम्प्लीमेंटेशन गाइडलाइन्स, 2020)
एनईपी 2020 के मुताबिक, प्रोजेक्ट-बेस्ड असेसमेंट को स्कूलों के ‘इंटरनल मार्क्स’ (Internal Marks) में पूरी तरह से इंटीग्रेट किया जाएगा। बच्चा पूरे साल प्रोजेक्ट्स में कैसा परफॉर्म कर रहा है, उसकी अटेंडेंस, उसका टीम-वर्क—इन सबके आधार पर स्कूल लेवल पर ही मूल्यांकन होगा।
कौशल मेला – मार्च 2027 का महा उत्सव
इस पूरे असेसमेंट का सबसे रोमांचक हिस्सा है- Kaushal Mela (कौशल मेला)।
जनवरी 2026 में हुए अनाउंसमेंट के अनुसार, पहला कौशल मेला मार्च 2027 में आयोजित किया जाएगा। यह पुराने ज़माने के उन बोरिंग साइंस एक्सहिबिशन की तरह नहीं होगा जहाँ बच्चे थर्मोकोल के ज्वालामुखी ले आते थे।
कौशल मेला एक भव्य इवेंट होगा जहाँ बच्चे पूरे साल की अपनी मेहनत को शोकेस करेंगे – चाहे वो किचन गार्डन की ताज़ी सब्जियां हों, लकड़ी का वर्किंग मॉडल हो, या डिज़ाइन किया हुआ एनीमेशन गेम। इसी मेले के दौरान उनका फाइनल इवैल्यूएशन किया जाएगा। सोचिए वो दिन कितना गर्व का होगा जब आपका बच्चा एक कॉन्फिडेंट ‘मेकर’ के रूप में अपनी क्रिएशन दुनिया के सामने रखेगा!
जीवन जीने की कला और आख़िरी विचार
मुझे याद है, कुछ साल पहले मैंने एक 12वीं क्लास के बच्चे को देखा था जिसे 95% मार्क्स मिले थे, लेकिन उसे अपने घर का फ्यूज़ बांधना या साइकिल की चेन चढ़ाना नहीं आता था। हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे थे जो कागज़ पर तो बहुत स्मार्ट थी, लेकिन रियल लाइफ में घबरा जाती थी।
कौशल बोध कक्षा 6 उसी गलती को सुधारने की एक ईमानदार कोशिश है।
कक्षा 6 में शुरू हो रहे ये 110 घंटे सिर्फ एक स्कूल का पीरियड नहीं हैं। यह वो समय है जब आपका बच्चा अपनी उँगलियों पर लगी मिट्टी से प्रकृति का सम्मान करना सीखेगा। पैरेंट्स और टीचर्स होने के नाते, हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम इस बदलाव का खुले दिल से स्वागत करें। बच्चों को परफेक्ट प्रोजेक्ट्स बनाने का प्रेशर न दें, बल्कि उन्हें इस प्रोसेस को एन्जॉय करने दें।
आज ही अपने बच्चे से बात करें, और पूछें: “इस बार कौशल बोध के प्रोजेक्ट में हम दोनों मिलकर क्या नया बनाने वाले हैं?”
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q. क्या कौशल बोध कक्षा 6 की किताब पीडीएफ फॉर्मेट में उपलब्ध है?
हाँ, एनसीईआरटी ने DIKSHA पोर्टल पर कौशल बोध की पीडीएफ और टीचर्स के लिए सप्लीमेंट्री ट्रेनिंग वीडियोज़ उपलब्ध करा दिए हैं।
Q. अगर हमारे स्कूल में कम्पोजिट स्किल लैब नहीं है तो क्या होगा?
सीबीएसई ने स्कूलों को कम्पोजिट स्किल लैब सेटअप करने के लिए गाइडलाइन्स जारी कर दी हैं। ग्रामीण स्कूलों के लिए फाइनेंसियल ग्रांट्स का भी प्रावधान है। तब तक के लिए बच्चे लोकल और ‘कबाड़ से जुगाड़’ वाले प्रोजेक्ट्स कर सकते हैं।
Q. क्या यह सिर्फ सीबीएसई स्कूलों के लिए है?
फिलहाल सर्कुलर Skill-81/2025 सीबीएसई स्कूलों पर लागू होता है। लेकिन एनईपी 2020 के तहत सभी स्टेट बोर्ड्स भी जल्द ही इसी तरह के फ्रेमवर्क को अपना रहे हैं।
[पारदर्शिता और संपादकीय डिस्क्लोजर]
यह लेख व्यावसायिक शिक्षा और एनईपी 2020 के आधिकारिक दिशा-निर्देशों के आधार पर तैयार किया गया है। सभी नीतिगत आंकड़े, टाइमटेबल रूल्स और ‘कौशल मेला’ की जानकारी सीबीएसई सर्कुलर (Skill-81/2025) और एनसीएफ-एसई 2023 से सत्य-जांची (Fact-checked) गई हैं। हमारा उद्देश्य बिना किसी कमर्शियल बायस के छात्रों और शिक्षकों तक सटीक जानकारी पहुँचाना है।